फिक्र – A Poem on our Common Insecurities

क्या कोई ख्याल तुम्हारा  नहीं ?

कोई तो होगा !

कोई डर – कोई शर्म …जो मिल्कियत हो बस  तुम्हारी !

या तेरे  सारे डर .. तुम्हारी  सारी  फिक्रें….

बस उधार के ही हैं ?

 

वो बीज देते हैं ( अपनी ) फिक्र के तुमको ,

तुम सींच के बरगद कर देते हो .

अपनी बेफ़िक्री कि छाँव में..

उसे सुखा क्यूँ नहीं देते ?

 

 

ये बेरोज़गारी उतनी बुरी भी नहीं ,

थोड़ी  फुर्सत है , आखिरी सुकून है ,

फिर मिले न मिले .

इस  शर्म कि मिलावट ने इसे बदनाम कर दिया है .

ये बड़ा खुबसूरत  सुकून होता , जो बेरोज़गारी तेरी  …

रिश्तेदारों का रोज़गार न होती

अबके चचा जो प्लेसमेंट की बात कर , बारीक सा हंसें ,

अपने बड़े सपने बताकर , उन्हें खुल के हंसा क्यूँ नहीं देते .

 

 

ये जो तुझे  गिरते बालों कि फिक्र है अब ,

पहले पहल तुम्हारी न थी .

तुम्हारे चेहरे से बेवजह भटकती ..

 कुछ फिक्रमंद आँखों ने, दे दी हैं तुमको ,

तुम्हारा मोटापा , तुम्हारा रंग – ये परेशानी उनकी थी ,

उनकी  खूबसूरती नसीब था  तुम्हारा ….

उसको समझा क्यूँ नहीं देते !

  

ये जो उससे  रिश्ते बिगड़ जाने का डर है

क्यूँ बस तुम्ही को  है

अगर एक ही गाडी के  पहिये हो तुम  

तो वो  क्यूँ डगमगाता  नहीं ?

तुम खूबसूरत हो उससे जो हर बार माफ़ कर देते हो

पर इसबार जो वो चिल्लाये तुमपर

तो बस बराबरी के लिए –

धीमे ही सही – बुदबुदा क्यूँ नहीं देते

 

 

नौकरी चले जाने का डर ,

बस तुम्ही को नहीं ,

अपनी रोटी कि फिक्र में वो तुझे  धमकता है  .

चोट कि शिद्दत अगर ऊंचाई तय करती है , 

 तो यकीनन उसका डर  तुमसे बड़ा होगा  !

अबके जो आंखे दिखाके वो डराए तुमको ,

आंखे मिला के उसको डरा क्यूँ नहीं देते !

 

 

उन  सबको उम्मीदें हैं  तुमसे…

जिन्होंने अपनी पूरी न की !

पीढियां रिले रेस कि बैटन थमा के,

सुस्ताती हैं और चिल्लाती हैं  के तुम और तेज़ भागो ,

ताकि तुम्हारी जीत उनकी हार ढक ले .

जब जानते हो सब तो वो फालतू सी चीज..

हाँथ से गिरा क्यों नहीं देते !

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