रंग ….

ये रंग क्या है ?…. कहाँ बना था?

रखा कहाँ था ?……. सबसे पहले।

मेरा गेरुआ- और हरा तुम्हारा,

बंटा था जब- उससे भी पहले !

रखा कहाँ था ?….

बनाने वाले ने जब बनायीं  ये दुनिया

यकीं है मेरा- सादी ही होगी !

बेरंग दुनिया में रंग भरने,

 उसने सदियां लगाई होंगी !

 

पहले रंगो के कारखाने लगाए होंगे

अपने ख्वाबों की रंगत समझकर 

 आज जो  तुम देखते हो

रंग सारे एक  एक कर  उसने बनाये होंगे

 

रंग के सारा आसमां नीला ही नीला

छुआ न होगा -सुखाया होगा

बची नील डाल के समन्दरों में

पानी सोने का सूरज पे चढ़ाया होगा

 

कौन सी कोठरी में इतना काजल बनाया

की आसमा पे पोत के रात कर दी

नज़र न लगे रातों को उसकी एहतेयादन

रात के माथे पे – चाँद का टीका लगाया 

 

 

 बच गया जो रंग उसने हमपे डाला

फिर मुस्कुराया

खेली होली रंगो की

ऐसे हुए हम , जैसा उसने हमको बनाया

 

अब न जाने कितने रियासतों की सियासतें ही

इन गोरे काले रंगतों पे टिकी हुई हैं

रंगो का कारोबार कुछ यूं चला है

हर सांवली शक्ल शर्म से झुकी हुई है

 

विरासत में जो साझा रंग मिले थे

पिछले बंटवारे में हमने बाँट डाले

कसम है जो मैं हरा छुऊँ उसका

ज़ुर्रत है जो वो मेरा गेरुआ लगा ले

 

एक बार फिर आके मालिक समझा दे सबको

रंग सारे तेरे ही फिर गुरेज़ कैसा

छिड़कूं अबके गेरुआ जो मस्जिदों पे

कोई कुछ न बोले

रंग दूँ हरा जो मंदिर – पंडित मुस्कुराये

तुम्हारे बच्चे यहाँ तुमसे भी बड़े हैं

अब तुम आओ तो ही  होली मनाये 

 

HiglishLy wish you all a very peaceful and colorful  HOLY…

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