छोटा सा सच !

 पहले , हर बच्चे के दो-दो जन्मदिन हुआ करते थे.
पहला पूर्णतः निजी !
जो बच्चे के अभिभावक एक डायरी में लिख कर के रखते थे.
आवश्यकता पड़ने पर यह संवेदनशील जानकारी सिर्फ घर के पंडित जी के साथ में साझा की जाती थी. ( even wikileaks and cambridge analitica couldnt break the firewall of that godrej almirah)

दूसरा विशुद्ध सरकारी !
यह असल जन्मदिन के 1 या 2 साल बाद का होता था.
और निश्चित तौर से जुलाई में.
यह शैक्षणिक सत्र के साथ तालमेल बिठाने के लिए किया जाता था जिसकी सलाह स्वयं मास्टरजी ही देते थे.
अगर सर्वे कराएं तो स्कूल जाने वाले 90% भारतीय शायद जुलाई में ही पैदा हुए हो.
कोई आश्चर्य नहीं अगर आपका सरकारी जन्मदिन भी जुलाई में पड़ता हो !

अब इतने बरस बाद एक नया जन्मदिन और आ गया है.
Facebook वाला !
यहां जन्म की तारीख तो सही होती है.
बस जन्म का साल उस न्यूनतम स्तर पर रखा जाता है जहां तक पब्लिक बर्दाश्त कर ले जाए.
कल मैं Facebook पर 33 का हो गया.
असल में 34 का.
और सरकारी रिकॉर्ड में अभी 32 का ही हूं……

मैं आपको यह सब क्यों बता रहा हूं ?
बस एक कहानी याद आ गई थी.

 

 

बरसों पहले छुट्टियों में गांव आया था.
उम्र रही होगी यही कोई 5-6 बरस.
अब ये बरसों पहले कितना पहले था आप समझ सकते हैं.
मई का महीना था .

सूरज चूल्हे की तरह जलता था और धरती रोटी की तरह पकती थी.
A C और भूत दोनों के बारे में सुना था लेकिन देखा  किसी को नहीं  था.

बिजली भी किसी  संस्कारी दामाद की तरह घंटे 2 घंटे से ज्यादा रुकती नहीं थी.
इसीलिए हमारे यहां पंखा चलता कम,  झला ज्यादा जाता था.
ऐसी दुपहरी में जब घर के बच्चों को जेड प्लस सिक्योरिटी दी  जाती थी.
और घर से बाहर निकलने पर ,बिना किसी संस्तुति के (without any recommendation) पीठ पर पुरस्कार.
मैं घर से भागा था,……. बड़े भाई के पीछे -पीछे !

टारगेट था 2-4 पके आम या एक-आध कच्चे अमरूद.

बड़े भाई साहब जो हम से 2 साल ही बड़े थे आधे रास्ते से गायब हो लिये.
बड़ा धोखा हुआ !
आम के पेड़ अचानक ही बड़े ऊंचे लगने लगे.
मैं वापस ही लौटने वाला था जब महाशय पुनः प्रकट हुए.
चेहरे पर एक अलौकिक आनंद लिए जैसे सत्य की खोज कर ली हो.
और बड़े ताव से जेब से एक डिबिया निकालकर दिखाई.
ये बाजार में मिलने वाली पारले पोपिंस ( a bunch of  colourful candies in one pack )की तरह थी
उन्होंने बताया कि  किस प्रकार अद्वितीय वीरता का प्रदर्शन करते हुए
उन्होंने  घर से यह डिबिया चुरा ली है.
और फिर जिस विस्तार से उन्होंने अपनी पराक्रम की व्याख्या कि वह और भी प्रेरणा दायक थी .
लेकिन दोपहर का समय आम खाने का होता है

बाग़ में पॉप्पीन्स खाना  बगीचे का अपमान होता.
उन्होंने सूचित किया कि पॉप्पीन्स शाम को खाएंगे.

अब क्योंकि मैंने पहली बार घर से भागकर अपने बड़े होने का प्रमाण दिया है.
वह मुझे भी उसमे से पुरस्कार स्वरूप टॉफ़ी  दे सकते हैं.
लेकिन अंतिम निर्णय शाम को ही लिया जाएगा.
वापस आते समय हमने एक पपीते के पेड़ के नीचे डिबिया को छुपा दिया.
फिर आकर ऐसे सो गए जैसे कुछ हुआ ही नहीं.

शाम को नींद खुली तो देखा कि.
भाई साहब आंगन में कूटे जा रहे हैं.
लेकिन एक स्वतंत्रता सेनानी की भांति कुछ भी बताने को तैयार नहीं.
मां ने मुझसे रोते हुए पूछा कि बेटा कुछ जानते हो तो बता दो.

चाहे इतिहास मुझे गद्दार कहे.
मैं मां की आंखों के सामने पिघल गया.
और मेरी निशानदेही पर.
उस पेड़ के नीचे से वह डिबिया बरामद कर ली गयी.
पता चला वह डिबिया सल्फास  ( lethal poison used for agricultural purpose) की थी जो गेहूं में डालने के लिए रखी हुई थी.

उस रोज़ देर रात तक भाई साहब की पीठ पूजा हुई

भाई साहब के साथ हमारे संबंध तभी से  मधुर है.

आज एक कमरे से दूसरे कमरे में आकर भूल जाता हूं कि मैं किस लिए आया था.
लेकिन 30 साल पुरानी वो  घटना आज तक याद है.

कल जब अपनी बुरी आदतों की लिस्ट बना रहा था.
तो उसमें सच बोलना भी डाल दिया था.
पिछले कुछ वर्षों में मुझे सबसे ज्यादा परेशानी इसी की वजह से हुई है.
लेकिन फिर मुझे यह घटना याद आ गई.
यह पोस्ट डालने से पहले मैंने Facebook पर अपनी उम्र सही कर दी है.
पता नहीं 1 साल बड़ा  हुआ हूं या 30 साल छोटा.
4 साल की उम्र में जिंदा बच गया क्योंकि झूठ नहीं बोल पाया.
अब छोटे-छोटे सच बोल कर अपने अंदर के छोटे बच्चे को फिर से जिंदा कर रहा हूं.

सच बोलिए क्योंकि इसका कोई विकल्प नहीं है.
और हां ! आपको याद भी नहीं रखना पड़ता कि पिछली बार आपने क्या बोला था.

happy birthday to me !

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